नाना ने अपना फिल्मी कैरियर 1978 में फिल्म ‘गमन’ से शुरू किया। काफी समय तक वह रंगमंच से जुड़े रहे और फिर 1987 में ‘मोहरे’ और 1988 में ‘सलाम बाम्बे’ के जरिये उन्होंने बाॅलीवुड में फिर दस्तक दी। लेकिन उन्हें असली पहचान 1989 में आई फिल्म ‘परिंदा’ से मिली। इस फिल्म में वह खलनायक की भूमिका में थे। अपने दमदार अभिनय के लिए उन्हें उस वर्ष का सह अभिनेता श्रेणी में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिले। 1992 में आई फिल्म ‘अंगार’ में अपनी सशक्त भूमिका के लिए उन्हें उस वर्ष सर्वश्रेष्ठ खलनायक श्रेणी का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला।
1994 में नाना के हिस्से में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार फिल्म ‘क्रांतिवीर’ के जरिये आया। इस फिल्म के जरिये नाना ने धूम मचा दी थी। इस फिल्म में सशक्त अभिनय के लिए नाना को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार और स्टार स्क्रीन अवार्ड भी मिला। नाना के साथ खास बात यह है कि वह भले पर्दे पर गुस्सैल अभिनेता नजर आते हों लेकिन उनके अभिनय में विविधता रहती है। 1996 में आई ‘अग्निसाक्षी’ में जहां वह अपनी पत्नी पर अत्याचार करने वाले पति के रूप में नजर आए तो वहीं ‘खामोशी द म्यूजिकल’ में एक गूंगी बेटी के मजबूर पिता के रोल में नजर आए। 2005 में ‘अब तक छप्पन’ में वह एनकांउटर स्पेशलिस्ट पुलिसवाले के रोल में छा गए तो 2007 में ‘वेलकम’ में मजाकिया डाॅन के रूप में उन्होंने दर्शकों का मनोरंजन किया।
नाना अभिनेता के साथ-साथ कहानीकार और फिल्म निर्देशक भी हैं। वह फिल्म ‘प्रहार’ का निर्देशन कर चुके हैं। फिल्म ‘अपहरण’ में नाना का खलनायक वाला किरदार दर्शकों के दिमाग पर आज तक छाया हुआ है। इस भूमिका के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ खलनायक का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला था। इसके अलावा नाना कुछ फिल्मों में गायन भी कर चुके हैं इनमें ‘यशवंत’, ‘वजूद’ और ‘आंच’ प्रमुख हैं। नाना ने हिन्दी फिल्मों के अलावा कई मराठी फिल्मों और नाटकों में भी काम किया है।
नाना भारतीय सेना के मानद कैप्टन भी हैं। उन्होंने फिल्म ‘प्रहार’ में अपनी आर्मी आफिसर की भूमिका के लिए सेना का प्रशिक्षण भी लिया था। वह 90 के दशक में टेरिटोरियल आर्मी में शामिल हुए थे। इसके अलावा नाना को राइफल शूटिंग का भी शौक रहा है। |